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9 Unknown facts about Lord Shree Krishna's Marriage, which will surprise you !


Most of the people know that Lord Shree Krishna had too many queen's and had married with many women, but they do not know the real fact's lying behind the scene. This information is for those people who do not have sufficient knowledge about Lord Shree Krishna and have some misconception's.
                                                               
Let us go through the real story behind marriage's of Lord Shree Krishna and share such good spiritual quotes in hindi to all.
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भगवान कृष्ण का सत्यभामा के साथ विवाह --
सत्यभामा सत्राजित की पुत्री थी | सत्राजित ने भगवन पर स्यमन्तक मणि की चोरी और अपने भाई की मृत्यु का आरोप लगाया था  | परन्तु जब उसके सामने प्रभु ने साडी सच्चाई रखी और स्यमन्तक मणि भी मिल गयी तो वो बहुत ही लज्जित हो गया  | सत्राजित ने सोचा की " मैं बहुत अदूरदर्शी छुद्र हूँ, मुझसे बहुत बड़ी मूर्खता हो गयी अब ऐसा क्या करूँ की लोग मुझे कोसे  नहीं " 


ऐसा सोचकर उसने निश्चय किया और अपनी पुत्री सत्यभामा और स्यमन्तक मणि दोनों को प्रभु श्री कृष्णा को अर्पण कर दिया |प्रभु ने स्यमन्तक मणि को वापस कर दिया और सत्यभामा को भार्या के रूप में वरण कर लिया | 

( जिस तरह रुक्मिणी जी लक्ष्मी माँ का अवतार थीं उसी प्रकार सत्यभामा जी पृथ्वी माँ की अवतार थीं )

Lord Krishna's Marriage with Satyabhama -

Satyabhama was the daughter of King Satrajit | Satrajit blamed Lord Krishna for the murder of his brother and theft of "Smayantak Mani ". But, when the truth was found and 'Smayantak Mani ' was also found, then king Satrajit felt very ashamed. He thought himself a looser. He was thinking about what to do so that people could not condemn him for his foolishness. Then, ultimately he decided to marry her daughter with Lord Krishna and give the 'Smayantak Mani' to Lord Krishna. But, Lord Krishna returned the ' Smayantak Mani " and married with " Satyabhama "
( Rukmini was embodiment of Goddess Lakshmi, same way Satyabhama was the embodiment of Goddess Prithvi )





भगवान श्री कृष्ण का रुक्मिणी के साथ विवाह -

रुक्मिणी विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री थी | उनके पांच भाई थे क्रमशः रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश , एवं रुक्ममाली | 
रुक्मिणी के भाई एवं युवराज रुक्मी ने अपने मित्र शिशुपाल के संग रुक्मिणी का विवाह निश्चित कर दिया | जबकि रुक्मिणी के पिता और बाकि सभी भाई श्री कृष्ण से उनका विवाह करना चाहते थे, परन्तु युवराज के वचन के कारण कोई विरोध न कर सका |
रुक्मिणी भी भगवान को मन ही मन वरण कर चुकी थी |
जब उन्होंने देखा की उनका धर्मसंकट में है और कोई उनकी सहायता करनेवाला नहीं है तब उन्होंने एक ब्राह्मण को पत्र लिखकर भगवान कृष्ण के पास भेजा और भगवान कृष्ण को अपनी सहायता के लिए बुलवाया | पत्र पाकर भगवान कृष्ण तुरंत आये और जरासंध , शिशुपाल, रुक्मी जैसे वीरो को परास्त करते हुए रुक्मिणी को द्वारिकापुरी ले गए जहाँ उनका उन्होंने विधिवत पाणिग्रहण किया | 

Lord Krishna's Marriage with Rukmini -

Rukmini was the daughter of king of Vidarbha - Bhismak. She had 5 brother's Rukmi, Rukmrath, Rukmbahu, Rukmesh and Rukmmaali respectively. Rukmi had fixed the marriage of Rukmini with his friend " Shishupal " , while her father and all other brothers wished to get her married with Lord Krishna, but nobody could resist the oath of the prince Rukmi.
Rukmini had accepted Lord Krishna as her husband by heart.

When she saw that nobody could help her then she sent a letter to lord Krishna and asked him for help. Getting the letter, Lord Krishna came and defeated Jarasandh, Shishupal and Rukmi and took Rukmini to Dwarikapuri where he married with her with all rites and rituals.







भगवान श्री कृष्ण का जांबवती के साथ विवाह -

भगवान श्री कृष्ण जब स्मयंतक मणि को ढूंढते ढूंढते ऋक्षराज जांबवान की गुफा में पहुंचे, वहां उनके और जांबवान के बीच बारह दिनों तक घोर युद्ध हुआ, अंततः भगवान श्री कृष्ण की जीत हुयी | जांबवान ने भगवान से कहा की स्वयं नारायण के सिवाय कोई उन्हें हरा नहीं सकता, आपको पहचानने में मुझसे भूल कैसे हो गयी ? प्रभु, आप मेरे प्रभु राम हैं जो कृष्ण के रूप में मेरे सामने प्रकट हैं | 
ऐसा कहते हुए जांबवान ने अपनी गलती का पछतावा करते हुए स्यमंतक मणि  के साथ साथ अपनी पुत्री जांबवती का हाथ भगवान कृष्ण को सौंप दिया  |

( जांबवान त्रेता में भगवान राम के साथ मिलकर रावण के साथ युद्ध किये थे, वो रामभक्त एवं ब्रह्माजी के अवतार थे )





भगवान कृष्ण का कालिंदी जी से विवाह -

एक बार भगवान कृष्ण अर्जुन के साथ शिकार खेलने गए थे, वह प्यास लगने पर पानी पीने यमुना जी के किनारे गए | भगवान कृष्ण ने देखा की एक अत्यंत रूपवती कन्या वहां तपस्या कर रही है | श्री कृष्ण के भेजने पर अर्जुन उसके पास गए और उसका परिचय पूछा और तप का कारण जानना चाहा, इस पर उस कन्या ने कहा - हे अर्जुन, मैं भगवान सूर्यदेव की पुत्री हूँ और भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए तप कर रही हूँ | अर्जुन ने भगवान को सारा वृतांत बताया | तब प्रभु कालिंदी जी को अपने साथ ले आकर उनका विधिवत पाणिग्रहण किये |
( कालिंदी जी यमुना जी ही थीं, इसीलिए यमुना जी को भगवान की पत्नी कहते हैं )





भगवान कृष्णा का मित्रविन्दा के साथ विवाह -
अवंती ( उज्जैन) के रजा विन्द और अनुविन्द वो दुर्योधन के चाहनेवालों में थे | उनकी बहन थी मित्रविन्दा | मित्रविन्दा स्वयम्वर में भगवान कृष्णा को अपना पति बनाना चाहती थी, परन्तु विन्द अनुविन्द ने रोक दिया, जिस पर भगवान ने मित्रविन्दा की मन की बात जान उनका हरण कर लिया और सभी राजाओ को परस्त करके मित्रविन्दा को अपने साथ द्वारिका ले गए और वहां विधिवत पाणिग्रहण किया |

( मित्रविन्दा भगवान कृष्णा की फुआ राजधिदेवी की कन्या थी )






भगवान कृष्णा का सत्य ( नाग्नाजिती) के साथ विवाह –

कौशल देश के रजा नाग्नाजीत की पुत्री थी सत्या |
उन्हें नाग्नजिती नाम से भी जाना जाता था | भगवान ने नग्नाजित से सत्या का हाथ माँगा, जिस पर राजा ने कहा की प्रभु मैं बहुत ही प्रसन्न होऊंगा, की मेरी पुत्री को आप पति के रूप में प्राप्त हों | परन्तु प्रभु मैंने अपनी पुत्री को, उसके योग्य वर प्राप्त हो इसके लिए पहले ही एक प्रण कर रखा है | प्रभु हमारे ये सातों बैल किसी के वश में आने वाले नहीं हैं, इन्होने बहुत राजकुमारों को खंड-खंड कर दिया है | यदि आप इन्हें वश बमें कर लें तो आप ही मेरी कन्या के पति होंगें |
कोशल नरेश की इतनी बात सुन प्रभु ने सातों बैलों को खेल-खेल में नाथ दिया और सत्या का पाणिग्रहण किया |



भगवान कृष्णा का भद्र के साथ विवाह  -

कैकय नरेश की कन्या थी भद्रा | उनके भाई संतर्दनआदि ने अपनी बहन की मन की बात जान स्वयं भगवान कृष्णा के साथ उनका विवाह कर दिया |









लक्ष्मणा के साथ भगवान कृष्णा का विवाह 
मद्र-प्रदेश के राजा वृहत्सेन की पुत्री थी लक्ष्मणा |
उनका स्वयम्वर काफी हद तक द्रोपदी के स्वयंवर के समान था | परन्तु उसमे मछली को कपडे से इस प्रकार ढककर रखा गया था जिससे उसकी छवि तेल में तो दिखे परन्तु मछली नहीं दिखती थी |
बहुत से रजा तो धनुष को उठा नहीं पाए | कोई उठा पाया तो प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया | इस स्वयंवर में अर्जुन भी गए थे परन्तु उनका बाण मछली की आँख को छूकर रह गया गया उसे भेद नहीं पाया | तब भगवान ने खेल खेल में धनुष उठाकर मछली की आँख को भेद दिया | इस प्रकार भगवान ने लक्ष्मणा का पाणिग्रहण किया |





१६१०० राजकुमारियों का भगवान कृष्णा के द्वारा पाणिग्रहण –
भौमासुर नाम के एक आततायी  राक्षस ने देवलोक से लेकर भूलोक तक में आतंक फैला रखा था | उसने देव, गन्धर्व और मृत्युलोक की १६१०० राजकुमारियों को बंदी बना रखा था | एक अभीष्ट मुहूर्त में वो इन कुमारियों का पाणिग्रहण करता जिससे वो अजर अमर हो जाता | इंद्रा आदि देवताओं की विनती पर प्रभु ने भौमासुर का वध किया | अब १६१०० राजकुमारियां मुक्त हो चुकी थीं | प्रभु ने उनके कहा की वो अब मुक्त हैं, इसपर उन राजकुमारियों ने कहा- प्रभु अब हम आपकी शरण में हैं, अब हम कहाँ जायेंगें | हम सबने आपको ही अपना पति वरण कर लिया है | हमारा कल्याण करें प्रभु !

राजकुमारियों की ऐसी विनती पर प्रभु उन सबको द्वारिका लाये और उन सबका एक साथ पाणिग्रहण किया |


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